Tuesday, January 19, 2010

वो ना समझा (vo na samajha)....

 वो ना समझा जिसे हम समझाते रहे,
सारी दुनिया से हम भी छुपाते रहे |

वो ना समझा मेरी दिल के उस राग को ,
पेड़ पौधे भंवर भी जिसे गुनगुनाते रहे |

वो कहता रहा बनव्ाऊंगा एक महल तेरे वास्ते
छोटे छोटे घरोंदे हम भी बनाते रहे |

सारी दुनिया की नज़रों में मैं गिर गया,
वक़्त बेवक़्त मुझे वो भी आजमाते रहे |

वो करता रहा किसी बड़े हादसे का इंतज़ार,
छोटे छोटे जख्म हम भी छुपाते रहे |

वो लिखता ही रहा एक गीत मेरे वास्ते,
छोटे छोटे शेर हम भी गुनगुनाते रहे |
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vo na samajha jise hum samjhate rahe,
sari duniya se hum bhi chhupate rahe |

vo na samjha meri dil ke us raag ko ,
ped paudhe bhanvar bhi jise gungunate rahe |

vo kahta raha banvaoonga ek mahal tere vaaste
chhote chhote ghanrode hum bhi banaate rahe |

saari duniya ki nazaron mein main gir gaya,
vaqt bevaqt mujhe vo bhi aajmate rahe |

vo karta raha kisi bade haadse ka intzaar,
chhote chhote jakhm hum bhi chhupate rahe |

vo likhata hi raha ek geet mere vaaste,
chhote chhote sher hum bhi gungunaate rahe | 

Monday, January 18, 2010

Bazar (बाज़ार)

                                   ---Bazar---

Pahle tha suna , ab yakin sa ho chala hai,
har sakhs kyon yahan bika bika sa laga hai |

Grahak to hamesha khush dikhate hain bazaron main,
har kharidadar bhi kyon yahan luta luta laga hai |

Insan hi bikte hain, insan hi kharidadar hain,
Es jahan main aaj , insano ka bazar laga hai |

Har shakhs ne khud hi tay kar rakhi hain apni keematen,
kahin jajbaat kahin imaan kahin tan, ka takht laga hai |

kya kya nahin karta insan pet ki khatir,
zameer ke kamre pe aaj, bhookh ka tala laga hai |

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                                     ---बाज़ार---

पहले था सुना , अब यक़ीन सा हो चला है,
हर शख्स क्यों यहाँ बिका बिका सा लगा है |

ग्राहक तो हमेशा ख़ुश दिखते हैं बाज़ारों में,
हर ख़रीददार भी क्यों यहाँ लुटा लुटा लगा है |

इंसान ही बिकते हैं, इंसान ही ख़रीददार हैं,
इस जहाँ मैं आज , इंसानो का बाज़ार लगा है |

हर शख्स ने ख़ुद ही तय कर रखी हैं अपनी क़ीमतें,
कहीं जज़्बात ,कहीं ईमान, कहीं तन, का तख़्त लगा है |

क्या क्या नहीं करता इंसान पेट की खातिर,
ज़मीर के कमरे पे आज, भूख का ताला लगा है |

मेरा अंदाज़ (mera andaaz)

mujhse pyaar karna hai to mere andaz main kar
juban se na bol kuch , nigahon se izhaar kar |

lab hon khamosh ankhen kah jayen sab fasana,
mujhse kuch isi andaz mein ikraar kar |

main saamane na rahoon par dikhoon har taraf,
kuch is tarah mere pyaar mein doob jaaya kar |

sajo sanvaro khoob par aaina na rakho ghar mein,
meri ankhon mein hi khud ko nihara kar |

mein awaaj bhi na de paoon , tum chaunk jao ,
kuch is tarah meri dhadkanon main sumar kar |

mahfilon mein to khoob kahkahe lagaate ho,
kabhi tanhai mein khud ko ashkbar kar |

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मुझसे प्यार करना है तो मेरे अंदाज़ मैं कर,
ज़ुबान से ना बोल कुछ ,  निगाहों से इज़हार कर |

लब हों खामोश आँखें कह जाएँ सब फसाना,
मुझसे कुछ इसी  अंदाज़ में इज़हार कर |


मैं सामने ना रहूं पर दिखूं हर तरफ,
कुछ इस तरह मेरे  प्यार में डूब जाया कर |


सजो संवरो खूब पर आईना ना रखो घर में,
मेरी आँखों  में ही खुद को निहारा कर |


में आवाज़ भी ना दे पाऊँ , तुम चौंक जाओ  ,
कुछ इस तरह मेरी धड़कानों मैं शुमार कर |

महफ़िलों में तो खूब  क़हक़हे लगाते हो,
कभी तन्हाई में खुद को अश्कबार कर |

Wednesday, December 16, 2009

विद्रोह

कब तक तेरी हर बात को नियति मानकर
स्वीकारता रहूं में,
कब तक तेरे हर निर्णय को प्रारब्ध का फल
समझ टालता रहूं में
में ना समझू नियति को
ना जानू मर्म प्रारब्ध का
में तो जानता हूँ बस एक बात
जब कर्म पे हैं मेरा हक
तो फल पे क्यों नहीं मेरा अधिकार
मुझे दो बस इसी बात का उत्तर
कर्म और फल में कहाँ से आए
ये नियति प्रारब्ध आदि सब
आज में चाहता हूँ इन प्रश्नो का उत्तर
यदि इसे विद्रोह समझो तुम या तुम्हारा समाज
ये विद्रोह करूँगा में बार बार
हां हां विद्रोह करूँगा में बार बार |

Thursday, April 30, 2009

नींद से बोझिल आँखें थीं ....

नींद से बोझिल आँखें थीं अलसाई सुबह थी
शहनाइयों की गूँज थी विदाई की घडी थी
हंसी ठिठोली से माहौल खुशनुमा था
सबको अपने अपने घर पहुँचने की जल्दी थी
इन सब के बीच कहीं किसी एक कोने में
एक हिरनी चुपचाप दबी सहमी बैठी थी
किससे कहे वो अपना दुखडा किसे बताये अपना भय
सदा प्यारी मां को भी उसे भेजने की जल्दी थी
कैसा होगा नया घर कैसे होंगे उसके लोग
इसी सोच में वो कितनी ही रात जगी थी
पिता के कंधे पे सर रखकर रोना चाह रही थी
पर उन्हें भी अब सामान रखवाने की जल्दी थी
आ ही गयी वो घडी जिससे वो डरती थी
सखी सहेली मां मौसी उसे चुपाने साथ खड़ी थीं
रोते रोते कार में बैठी रोते में ही कार चली
मां बाबुल का आँगन वो तो पीछे छोड़ चली थीं

Wednesday, March 25, 2009

ना जाने किस धारा


ना जाने किस धारा मैं बहते जा रहे हैं लोग यहाँ,
कौन देखे क्या पीछे छोड़ते जा रहे हैं लोग यहाँ
कहीं दौलत कहीं शोहरत कहीं पेट की खातिर
इंसानियत को ही कुचलते जा रहे हैं लोग यहाँ
सब दौड़ रहे हैं अपनी अपनी मंज़िलों की जानिब,
अपनो का ही साथ छोड़ते जा रहे हैं लोग यहाँ
कभी लालच कभी मज़हब कभी सियासत के चलते
एक दूसरे का गला काटते जा रहे हैं लोग यहाँ
जिन दरखतों की जड़ों में हैं साँपों के बसेरे,
उनकी साखों पे मचाने बनाते जा रहे हैं लोग यहाँ
जिन चरागों को किया रोशन जमाने के वास्ते,
उन्ही से मेरा ही घर जलाते जा रहे हैं लोग यहाँ

Saturday, November 22, 2008

इधर कुछ दिनो से(Idhar kuch dino se)

इधर कुछ दिनो से वो फिर से,
कुछ दबी सहमी सी रहने लगी है
ना हिरनियों सी कुचालें भरती है
ना ही लबों पे कोई तराने लाती है
जैसे की सब कुछ भूल सी गयी है
याद रहती है तो बस वो तारीख
जब फिर से उसे नुमायशी बनाना होगा
फिर से होगी उसके चल ढाल, रंग रूप
पढ़ाई लिखाई , गुनो अवगुणो की पेशी
सारा दृश्य वोही होगा, बस कुछ बदलेगा
तो वो होंगे न्यायाधीशों के चेहरे
पर क्या फ़र्क पड़ता है
उसे तो इंतज़ार रहेगा बस उस निर्णय का
जो बंद कर सकता है उसकी ये पेशी
या फिर से उसे करनी पड़ेगी
नयी पेशी की तारीख की तैयारी.
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Idhar kuch dino se vo phir se,
kuch dabi sahmi si rahne lagi hai
na hiraniyon si kuchalen bharti hai
na hi labon pe koi tarane laati hai
jaise ki sab kuch bhool si gayi hai
yaad rahti hai to bus vo tareekh
jab phir se use numayashee banana hoga
phir se hogi uske chal dhaal, rang roop
padhai likhai , guno avguno ki peshi
sara drishya wohi hoga, bus kuch badalega
to vo honge nyayadheeshon ke chehre
par kya fark padta hai
use to intzaar rahega bus us nirnaya ka
jo band kar sakta hai uski ye peshi
ya phir se use karni padegi
nayi peshi ki tareekh ki taiyari.